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क्या आपने कभी सोचा है कि अगर आपने अपनी जिंदगी में वो एक फैसला न लिया होता, तो आज आप कहाँ होते? मान लीजिए, 10वीं कक्षा के बाद आपने साइंस की जगह कॉमर्स ली होती, या उस दिन बस छूटने की वजह से आप उस खास इंसान से न मिले होते जिससे आज आप प्यार करते हैं। हम सब कभी न कभी अपनी जिंदगी के अगर-मगर(What Ifs) के बारे में सोचते हैं। "काश मैंने वो नौकरी कर ली होती" या "काश मैं उस शहर में न गया होता"।
लेकिन क्या हो अगर मैं आपसे कहूँ कि यह सिर्फ ख्याली पुलाव नहीं है? क्या हो अगर सच में, इसी वक्त, ब्रह्मांड में कहीं दूर या शायद किसी और आयाम (Dimension) में आपका ही एक दूसरा रूप मौजूद है जिसने वो नौकरी कर ली थी? हो सकता है उस दूसरी दुनिया में आप एक अमीर बिजनेसमैन हों, या शायद वहां आप एक मशहूर फिल्म स्टार हों। सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी लगती है, है न? 'डॉक्टर स्ट्रेंज' या 'स्पाइडर-मैन' जैसी फिल्मों ने आजकल इस टॉपिक को बहुत हवा दी है। लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि 'मल्टीवर्स' (Multiverse) या 'समानांतर ब्रह्मांड' सिर्फ फिल्मों का मसाला नहीं है। यह विज्ञान की दुनिया का सबसे गंभीर, सबसे विवादित और सबसे रोमांचक सिद्धांत है।
आज के इस ब्लॉग में, हम इसी रहस्य की गहराई में उतरेंगे। हम बिल्कुल सरल भाषा में समझेंगे कि आखिर यह 'मल्टीवर्स' है क्या? क्या सच में हमारे जैसे कई ब्रह्मांड हैं? और विज्ञान (Science) के पास इसका क्या सबूत है? तो चलिए, अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाने के लिए तैयार हो जाइए, क्योंकि आज हम इस दुनिया से बाहर की सैर करने वाले हैं।
वैज्ञानिक परिभाषाओं में उलझने से पहले, इसे एक बहुत ही आसान उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आपके पास एक रेडियो है। जब आप 98.3 FM ट्यून करते हैं, तो आपको गाने सुनाई देते हैं। लेकिन क्या इसका मतलब यह है कि 93.5 FM या 104 FM पर गाने नहीं बज रहे? बिल्कुल बज रहे हैं। वे सभी गाने, सभी रेडियो स्टेशन एक ही समय पर, एक ही कमरे में मौजूद हैं। लेकिन आप उन्हें सुन नहीं पा रहे क्योंकि आपकी 'फ्रीक्वेंसी' अलग है।
मल्टीवर्स का सिद्धांत भी कुछ ऐसा ही कहता है। यह मानता है कि हमारा ब्रह्मांड जिसमें पृथ्वी, सूरज, चांद और हम सब हैं अकेला नहीं है। यह तो बस एक बुलबुला है। ऐसे अनगिनत बुलबुले, यानी अनगिनत ब्रह्मांड एक साथ मौजूद हो सकते हैं। हम उन्हें देख या छू नहीं सकते क्योंकि हम अपनी फ्रीक्वेंसी में कैद हैं। हो सकता है कि हमारे ठीक बगल में, एक इंच की दूरी पर, एक और दुनिया चल रही हो, लेकिन हम उसे महसूस नहीं कर सकते क्योंकि वह एक अलग आयाम (Dimension) में है।
वैज्ञानिकों ने इस थ्योरी को तीन-चार अलग-अलग तरीकों से समझाया है। आइए, इन्हें एक-एक करके समझते हैं, बिना किसी भारी-भरकम गणित के।
यह थ्योरी सबसे ज्यादा दिमाग घुमाने वाली है। विज्ञान कहता है कि "स्पेस" (Space) यानी अंतरिक्ष सपाट है और अनंत (Infinite) है। इसका कोई अंत नहीं है। अब यहाँ गणित का एक नियम काम आता है संभावनाओं का नियम (Probability)। अगर जगह अनंत है, लेकिन पदार्थ (Matter) बनाने वाले कण (Particles) सीमित हैं, तो एक न एक दिन उन कणों को खुद को दोहराना (Repeat) ही पड़ेगा।
इसे ऐसे समझिए: मान लीजिए आपके पास ताश की एक गड्डी है। आप कितनी बार अलग-अलग तरह से पत्ते बांट सकते हैं? करोड़ों बार, अरबों बार। लेकिन अगर आप अनंत काल तक पत्ते बांटते रहें, तो कभी न कभी, वही सेम (Same) पत्तों का क्रम दोबारा आएगा जो पहले आ चुका है। ठीक यही बात हमारे ब्रह्मांड पर लागू होती है। हमारे शरीर और यह दुनिया परमाणुओं (Atoms) से बनी है। अगर ब्रह्मांड अनंत है, तो कहीं न कहीं, बहुत दूर, परमाणुओं का वही संयोजन (Combination) फिर से बना होगा जो "आप" हैं।
वैज्ञानिक मैक्स टेगमार्क (Max Tegmark) ने तो इसकी दूरी भी नापने की कोशिश की है। उनके अनुसार, अगर आप ब्रह्मांड में सीधे चलते जाएं, तो 10 की पावर 10 की पावर 118 मीटर दूर आपको एक ऐसा इंसान मिलेगा जो बिल्कुल आपके जैसा दिखता है। वह आपकी ही तरह यह ब्लॉग पढ़ रहा होगा। फर्क बस इतना हो सकता है कि उसने लाल रंग की शर्ट पहनी हो और आपने नीले रंग की। इसे "लेवल 1 मल्टीवर्स" कहते हैं। यानी, आप इस ब्रह्मांड में अकेले नहीं हैं, आपके जैसे करोड़ों 'आप' वहां मौजूद हैं।
अब आते हैं दूसरी थ्योरी पर, जिसे 'इटरनल इन्फ्लेशन' (Eternal Inflation) कहते हैं। इसे समझने के लिए एक उबलते हुए पानी के पतीले की कल्पना करें। जब पानी उबलता है, तो उसमें बुलबुले बनते हैं। कुछ बुलबुले छोटे होते हैं, कुछ बड़े। कुछ जल्दी फूट जाते हैं, कुछ देर तक रहते हैं।
वैज्ञानिक मानते हैं कि 'बिग बैंग' के बाद अंतरिक्ष बहुत तेजी से फैला (Inflate हुआ)। लेकिन यह फैलाव हर जगह एक जैसा नहीं था। कुछ जगहों पर फैलाव रुक गया और वहां 'जेब' (Pockets) बन गईं। हमारा ब्रह्मांड ऐसी ही एक जेब या बुलबुला है जहाँ फैलाव रुक गया और तारे-ग्रह बन गए। लेकिन इस बुलबुले के बाहर, अंतरिक्ष अभी भी फैल रहा है और वहां और भी नए बुलबुले बन रहे हैं।
हर बुलबुला एक अलग ब्रह्मांड है। सबसे मजेदार बात यह है कि इन दूसरे ब्रह्मांडों के नियम हमारे नियमों से बिल्कुल अलग हो सकते हैं। हमारे यहाँ ग्रेविटी (गुरुत्वाकर्षण) चीजों को नीचे खींचती है, हो सकता है उस दूसरे बुलबुले में ग्रेविटी चीजों को ऊपर फेंकती हो। हमारे यहाँ प्रकाश की गति (Speed of Light) फिक्स है, हो सकता है वहां रोशनी कछुए की चाल से चलती हो। वहां का विज्ञान, वहां का रसायन शास्त्र (Chemistry) सब कुछ हमसे अलग हो सकता है। वहां शायद हम जैसा जीवन संभव न हो, या शायद वहां ऐसा जीवन हो जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते।
यह सबसे दिलचस्प थ्योरी है और यह सीधे हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ती है। इसे 'मेनी-वर्ल्ड्स इंटरप्रिटेशन' (Many-Worlds Interpretation) कहते हैं। यह थ्योरी क्वांटम फिजिक्स से निकली है। क्वांटम फिजिक्स, यानी बहुत छोटे कणों (जैसे इलेक्ट्रॉन) की दुनिया, बड़ी अजीब होती है। वहां एक कण एक ही समय पर दो जगहों पर हो सकता है। जब तक आप उसे देखते नहीं, वह हर जगह है।
1957 में एक वैज्ञानिक ह्यू एवरेट (Hugh Everett) ने एक क्रांतिकारी विचार दिया। उन्होंने कहा कि जब भी किसी घटना के एक से ज्यादा परिणाम हो सकते हैं, तो ब्रह्मांड बंट (Split) जाता है। इसे एक सिक्के के उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए आपने एक सिक्का उछाला। हेड (Head) आएगा या टेल (Tail)? क्वांटम थ्योरी कहती है कि जब सिक्का हवा में है, तो वह हेड और टेल दोनों है। लेकिन जब वह हाथ पर गिरता है, तो हमें सिर्फ एक ही नतीजा दिखता है, मान लो 'हेड'।
ह्यू एवरेट ने कहा कि 'टेल' वाला नतीजा गायब नहीं हुआ। उसी पल, ब्रह्मांड दो हिस्सों में बंट गया। एक ब्रह्मांड में आपने 'हेड' देखा, और दूसरे समानांतर ब्रह्मांड (Parallel Universe) में आपके ही दूसरे रूप ने 'टेल' देखा। और यह सिर्फ सिक्के तक सीमित नहीं है। यह आपके हर फैसले पर लागू होता है।
मान लीजिए आज सुबह आप नाश्ते में चाय पीने या कॉफी पीने को लेकर कन्फ्यूज थे। आपने चाय पी ली। लेकिन मल्टीवर्स थ्योरी के मुताबिक, उसी वक्त एक नया ब्रह्मांड बन गया जहाँ आपने कॉफी पी। इसका मतलब यह है कि आपकी जिंदगी में जितनी भी संभावनाएं थीं जिन लड़कियों/लड़कों को आपने प्रपोज नहीं किया, जिस नौकरी को आपने ठुकरा दिया, जिस रास्ते पर आप नहीं गए वे सब किसी न किसी ब्रह्मांड में सच हो चुकी हैं। वहां का 'आप' उस जिंदगी को जी रहा है जिसे आपने यहाँ छोड़ दिया था। यह विचार जितना रोमांचक है, उतना ही डरावना भी। इसका मतलब है कि हमारे हर पल के फैसले नई दुनिया बना रहे हैं।
अब आप कहेंगे, "भाई, ये सब तो कहानियाँ हैं, सबूत क्या है?" यह सच है कि अभी तक हमारे पास किसी दूसरे ब्रह्मांड से हाथ मिलाने का कोई तरीका नहीं है। हम इस ब्रह्मांड के पिंजरे से बाहर नहीं झांक सकते। लेकिन वैज्ञानिकों को कुछ ऐसे संकेत मिले हैं जो इस ओर इशारा करते हैं।
ब्रह्मांड में एक "कोस्मिक माइक्रोवेव बैकग्राउंड रेडिएशन" (CMB) है। यह बिग बैंग के समय की बची हुई रोशनी या गर्मी है जो पूरे ब्रह्मांड में फैली है। जब वैज्ञानिकों ने इसका नक्शा बनाया, तो उन्हें अंतरिक्ष में एक बहुत बड़ा और ठंडा धब्बा (Cold Spot) दिखाई दिया। यह जगह बाकी जगहों से बहुत ज्यादा ठंडी थी। सामान्य विज्ञान इसे पूरी तरह नहीं समझा पाया।
कुछ वैज्ञानिकों का मानना है कि यह ठंडा धब्बा एक "चोट का निशान" (Bruise) है। जैसे भीड़ में चलते हुए आप किसी से टकरा जाते हैं, वैसे ही शायद अरबों साल पहले हमारा ब्रह्मांड किसी दूसरे पड़ोसी ब्रह्मांड (Bubble Universe) से टकरा गया था। उस टक्कर ने हमारे ब्रह्मांड में यह निशान छोड़ दिया। अगर यह सच है, तो यह मल्टीवर्स का पहला ठोस सबूत हो सकता है।
इसके अलावा, वैज्ञानिक 'डार्क फ्लो' (Dark Flow) की भी बात करते हैं। उन्होंने देखा है कि ब्रह्मांड के कुछ गैलेक्सी क्लस्टर्स (Galaxy Clusters) एक खास दिशा में बहुत तेजी से बह रहे हैं, जैसे उन्हें कोई बहुत बड़ी चीज खींच रही हो। लेकिन उस दिशा में हमारे ब्रह्मांड में कुछ भी नहीं है। वैज्ञानिक अनुमान लगाते हैं कि शायद हमारे ब्रह्मांड के बाहर मौजूद किसी दूसरे ब्रह्मांड का भारी गुरुत्वाकर्षण (Gravity) इन गैलेक्सीज को अपनी ओर खींच रहा है।
विज्ञान से हटकर अब थोड़ी देसी और रहस्यमयी बातें करते हैं। हम सबने कभी न कभी 'देजा वू' (Déjà vu) महसूस किया है। आप किसी नई जगह जाते हैं, या दोस्तों के साथ बैठे होते हैं, और अचानक आपको लगता है "अरे! यह पल तो पहले भी हो चुका है। मैंने बिल्कुल यही बात पहले भी सुनी है।" विज्ञान इसे दिमाग का एक केमिकल लोचा (Error) बताता है। लेकिन मल्टीवर्स में विश्वास रखने वाले लोग कहते हैं कि शायद यह उस पल की गूंज है जब दूसरे ब्रह्मांड में आपके 'हमशक्ल' ने ठीक वही काम किया। शायद कुछ पलों के लिए दोनों ब्रह्मांडों की फ्रीक्वेंसी मिल गई और आपको दूसरी दुनिया का अहसास हुआ।
यही बात सपनों के बारे में भी कही जाती है। क्या हमारे सपने सिर्फ हमारे दिमाग की उपज हैं? या फिर सपने वह खिड़की हैं जिनसे हम रात में अपने दूसरे रूपों (Other Selves) की जिंदगी देखते हैं? जब आप सपने में खुद को उड़ते हुए देखते हैं, या किसी अनजान शहर में देखते हैं, तो क्या पता वह किसी और ब्रह्मांड की हकीकत हो? यह साबित करना नामुमकिन है, लेकिन सोचने में क्या हर्ज है?
एक और मजेदार चीज है जिसे 'मंडेला इफेक्ट' (Mandela Effect) कहते हैं इसमें बहुत सारे लोगों को किसी पुरानी घटना की गलत याद होती है। जैसे, बहुत से लोगों को लगता था कि नेल्सन मंडेला की मौत 1980 के दशक में जेल में हुई थी, जबकि वे 2013 तक जिंदा थे। या फिर बचपन के कार्टून 'क्यूरियस जॉर्ज' की पूंछ थी या नहीं? (असली में नहीं थी, पर सबको याद है कि थी)। कुछ लोग मजाक में (और कुछ गंभीरता से) कहते हैं कि शायद हमारा ब्रह्मांड किसी दूसरे ब्रह्मांड से शिफ्ट हो गया है, इसलिए हमारी यादें और हकीकत मेल नहीं खा रहीं।
आपको जानकर गर्व होगा कि आधुनिक विज्ञान आज जिन बातों पर शोध कर रहा है, भारतीय दर्शन और पुराणों में उसका जिक्र हजारों साल पहले किया जा चुका है। हमारे यहाँ ब्रह्मांड को 'ब्रह्मांड' (Brahma-And) यानी ब्रह्मा का अंडा कहा गया है। और हमारे ग्रंथों में सिर्फ एक ब्रह्मांड नहीं, बल्कि 'अनंत कोटि ब्रह्मांड' (करोड़ों ब्रह्मांड) की बात कही गई है।
श्रीमद्भागवत पुराण की एक बहुत प्रसिद्ध कहानी है। एक बार भगवान ब्रह्मा को अपनी शक्ति पर घमंड हो गया। उन्हें लगा कि वही इस सृष्टि के एकमात्र रचयिता हैं। तब भगवान कृष्ण ने उनकी गलतफहमी दूर करने के लिए उन्हें एक दृश्य दिखाया। ब्रह्मा ने देखा कि उनके जैसे न जाने कितने और ब्रह्मा, जिनके 4 नहीं बल्कि 10, 100, या 1000 सिर थे, वे सब भगवान कृष्ण के सामने हाथ जोड़े खड़े थे। वे सभी अलग-अलग ब्रह्मांडों के रचयिता थे।
कृष्ण ने मुस्कुराते हुए कहा, "ब्रह्मा, तुम तो सिर्फ उस छोटे से ब्रह्मांड के रचयिता हो जो 4 अरब मील चौड़ा है। यहाँ ऐसे विशाल ब्रह्मांड भी हैं जो तुमसे लाखों गुना बड़े हैं।" यह कहानी साफ तौर पर मल्टीवर्स (Multiverse) की तरफ इशारा करती है। यह बताता है कि हमारा अस्तित्व इस विशाल रचना में रेत के एक कण से भी छोटा है। जो बात आज क्वांटम फिजिक्स कह रही है, वही बात हमारे ऋषि-मुनियों ने ध्यान और दर्शन के जरिए बहुत पहले समझ ली थी।
अंत में, सवाल यह आता है कि अगर मल्टीवर्स है भी, तो इससे हमारी जिंदगी पर क्या फर्क पड़ता है? मेरी ईएमआई (EMI) तो कम नहीं होगी, न ही ऑफिस का काम कम होगा। यह सच है। लेकिन यह विचार हमें एक बहुत ही खूबसूरत नजरिया देता है।
अक्सर हम अपनी जिंदगी में हुए फैसलों पर पछताते हैं। हम सोचते हैं कि "अगर मैंने वो गलती न की होती, तो आज मैं खुश होता।" मल्टीवर्स की थ्योरी हमें एक सुकून देती है। यह हमें बताती है कि शायद किसी दुनिया में, आप सफल हैं। किसी दुनिया में, आपको अपना खोया हुआ प्यार मिल गया है। किसी दुनिया में, आपने वो गलती नहीं की। यह सोच हमें अपनी असफलताओं को स्वीकार करने की ताकत देती है।
साथ ही, यह हमें विनम्र बनाती है। हम अपनी छोटी सी पृथ्वी, छोटे से देश और छोटे से शहर में खुद को बहुत बड़ा समझते हैं। लेकिन सच तो यह है कि हम बुलबुले के अंदर एक और बुलबुले में रह रहे हैं। ब्रह्मांड संभावनाओं का एक महासागर है।
तो अगली बार जब आप सिक्का उछालें, या कोई फैसला लें, तो एक पल के लिए रुककर मुस्कुराइएगा। क्योंकि हो सकता है कि उसी पल, आप एक नई दुनिया का निर्माण कर रहे हों। और कौन जाने, शायद किसी और दुनिया का 'आप' भी उसी वक्त आपके बारे में सोच रहा हो और कह रहा हो "काश, मैंने वो फैसला लिया होता जो उसने लिया है।"
आपका इस बारे में क्या सोचना है?दोस्तों, क्या आपको लगता है कि हमारे जैसा कोई और दूसरी दुनिया में मौजूद है? अगर आपको मौका मिले किसी दूसरे ब्रह्मांड में जाने का, तो आप अपने 'दूसरे रूप' (Doppelganger) से क्या पूछना चाहेंगे? क्या आप अपनी अभी की जिंदगी से खुश हैं या बदलना चाहेंगे?
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